Wednesday, 28 August 2019

तुम्हारी धुन में - Vk

पता ही नहीं चला कि वक़्त कब गुज़र गया
कि अभी जैसे कल की ही तो बात थी
ख़त्म सा हो चला सफ़र तुम संग
पर मानो अभी ताज़ा ताज़ा ही तो मुलाकात थी
इस कदर खो सा गया था मैं तुम्हारी धुन में
कि कोई और आवाज़ जैसे सुनाई देना ही बंद हो गई
तुम्हारी धुन में ही तो वो जादू चला
कि मेरी दुनिया इक हुजूम से चंद हो गई
असर तुम्हारी धुन का अब तक छाया है मुझपर
कि होश में आने की अब चाह ही ना रही
पर ये वक़्त इतना ज़ालिम है कि बजा रहा लगातार अपनी ही शहनाई
कि इसकी धुन के आगे दुनिया का पत्ता पत्ता नाचने को मजबूर
मैं कैसे समझूँ महफूज़ ख़ुद को, कैसे करूँ महसूस तुम्हें
क्योंकि लगातार झिंझोड़े जा रहा इसका बेसुरापन मेरे मन को
जो मोहित और मदहोश है,तुम्हारी धुन में।।

Wednesday, 31 July 2019

लालच

जहां दिखा ज़्यादा ज़्यादा
वहीं लुढ़क गया प्यादा
भूल गया हर वादा
नहीं रहा नेक इरादा
पर ध्यान रहे
कहीं ज़्यादा ज़्यादा के चक्कर में
हो ना जाये पूरे से आधा
और फिर कहना पड़े हारकर
क्यों किया ज़्यादा ज़्यादा
क्यों रहे हर समय छीनने में ही
क्यों न किया बांटने का इरादा
क्यों ना जिया जीवन सादा
क्यों किया ज़्यादा ज़्यादा
क्यों भूल गए हर वादा
कि अब बचा ही नहीं आधा
काश जिया होता जीवन सादा!!
काश जिया होता जीवन सादा !!!

Saturday, 20 July 2019

कलाकार और उम्र ( Artist & Age ) - by Vikas Relhan Vk

उम्र हर किसी पर अपना शिकंजा कसती है
हर किसी को करके रखती है अपने वश में
हर किसी को अहसास करवाती है पल पल घटती हुई साँसों का और बीते हुए पल का,
पर इस शिकंजे से अगर कोई आज़ाद है तो वो है कलाकार, हाँजी कलाकार!!
क्योंकि
कलाकार की कोई उम्र होती ही नहीं
कलाकार उम्रों का मोहताज हुआ ही नहीं
कलाकार कभी बूढ़ा होता ही नहीं।
अपने मन से, ख़्यालों से, विचारों से,कल्पना से और सृजन से,
वो हमेशा जवान और तरो ताज़ा रहता है,
निराशा में आशा, अविश्वास में विश्वास, असम्भव में सम्भव, असंभावना में सम्भावना, उदासी और ग़म में ख़ुशी, बुराई में भलाई और अच्छाई और नकारात्मकता में सकारात्मकता की रोशनी ढूंढ लेने की क्षमता होती है कलाकार में।
अपनी रचनाओं, अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत के माध्यम से,कल्पनाओं के समंदर में गोते लगाता हुआ, वो हर जगह कहीं ना कहीं किसी ना किसी गहराई के कोने में उम्मीद की किरण खोज ही निकालता है।
सही मायने में अगर कहा जाए तो कलाकार गुरु समान है बल्कि गुरु ही कहा जाए तो उचित होगा क्योंकि इस दुनिया और ईश्वर को आपस मे जोड़ने वाली बीच की कड़ी होता है कलाकार।।
हर कला के पुजारी को मेरा कोटि कोटि प्रणाम।।
सभी कलाकारों और कला प्रेमियों को सादर अभिनंदन।।
मेरी ये रचना सभी कलाकारों को समर्पित।।
धन्यवाद,
आपका अपना,
विकास रेल्हान (Vikas Relhan Vk)

Saturday, 13 July 2019

कुदरत क्या और किस्मत क्या?

नयी मंज़िलों की तरफ बढ़ने को
बेताब हैं मेरे कदम
मग़र रास्तों को गवारा नहीं
कि उनके सिवा कोई और
मंज़िलों की दहलीज को छुये।।

आसमाँ छूने को तैयार हैं ये हाथ मेरे
मग़र हवाओं को मंज़ूर नहीं
कि उनके सिवा कोई और
ऊँचाइयों को महसूस करे।।

समंदर की गहराई में
गोते लगाने को तैयार है
ये मन मेरा मग़र
लहरों को बर्दाश्त नहीं
कि उनके सिवा कोई और
पानी की गहराई को समझे।।

जब वजूद ही हाथ छोड़ दे
तो कुदरत क्या और किस्मत क्या???

Thursday, 11 July 2019

बस तू ही !!

शायद  कुछ गलतफहमी हुई है
शायद कोई तेरे मेरे दरमियान है
शायद तू नाराज़ है मुझसे
पर वजह मैं नहीं
कोई और है
कह तो दूं हर बात तुझसे
पर तू कभी हक़ तो देके देख
रही बात दुनिया की
तो ध्यान से सुन
मुझे नहीं परवाह किसी की
क्योंकि तू ही मेरी उदासी की शाम
और मेरी खुशियों की भोर है।।

मेरे मन की पीड़ा - Vk

जीवन के इस मोड़ पर
जहां इस वक़्त खड़ा हूँ मैं
इस मनस्थिति के साथ
कि जीना बहुत मुश्किल है
बिन तुम्हारे

पिघल रहा हूँ किसी बर्फ़ की नदी की तरह
और बह रहा हूँ क़तरा क़तरा
उस बंजर ज़मीं पर
जिस पर जितना भी पानी उड़ेल दो
मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है
उगना उम्मीदों की फ़सल का

जल रहा हूँ उस ज्वालामुखी की तरह
जिसे ना कोई चिंगारी दिखाता है
और ना ही कोई मजबूर करता है
उगलने के लिए लावा
बस वो जलता है अपने ही अंदर के ऊष्म मंथन से
भड़कता है अपने ही अंदर की आग से
लपटें उठाता है अपनी ही गर्मी से
और जला डालता है अपने साथ साथ
हर सामने आने वाली
दुनियावी चीज़ों को भी

इस दुनिया में कोई भी
इस बात के लिए नहीं होगा राज़ी
कि किसी की भी वजह से
मैं पिघलता रहा
और जलता रहा
क्योंकि हर कोई मशगूल है
अपनी अपनी दुनिया को सजाने में
हर कोई है व्यस्त
अपनी अपनी ज़रूरतों को पूरा करने में
क्यों लेगा ऐसे में कोई
मेरी तक़लीफ़ों की ज़िम्मेदारी

बस अब थकने सा लगा हूँ
धैर्य साथ छोड़ने लगा है
सब्र गिरने सा लगा है शायद
सम्भलना चाहता हूँ
जीना चाहता हूँ
खुश रहना चाहता हूँ

काश!!! कि कोई उम्रदराज़ आकर
दे दे मुझे अनुभव अपना
कि क्या होता है इसके बाद?
कौनसा होगा अगला पड़ाव?
कैसी होगी मन की स्थिति?
और कितना हो जाएगा परिपक्व मन?
जब ये सब होता है महसूस
ज़िन्दगी के सफ़र में
क्योंकि उनसे बेहतर कौन जानेगा?
उनसे बेहतर कौन समझेगा?
मेरे मन की पीड़ा!!!
मेरे मन की पीड़ा!!!
काश!!!!!

Wednesday, 10 July 2019

पहली दफा !!!

पहली दफ़ा!!!
पहली दफ़ा तेरी बात पर यकीं सा नहीं हो रहा
पहली दफ़ा तू लगा कुछ बदला बदला सा है
पहली दफ़ा अंदर तक हिल गया मैं
पहली दफ़ा साँस हलक में अटका अटका सा है
पहली दफ़ा बहुत ही ज़्यादा डर सा गया हूँ
पहली दफ़ा दिल सहमा सहमा सा है
पहली दफ़ा तुझे ग़ैर मौजूद पाया है अपनी ज़िन्दगी में
पहली दफ़ा मेरा जहां सूना सूना सा है
पहली दफ़ा ठेस पहुंची है मेरी इबादतों को
और तू कहता है कि ये सब बेमतलब सा है?


तुम्हारा होना !!!

तुम्हारा होना!!!
तपती गर्मी की चिलचिलाती धूप में भी भीगा भीगा सा रहता हूँ, मैं सावन सावन सा झूमता हूँ,
जब तू हवा भर सा भी छू जाता है मुझे एहसासों में

तुम्हारा ना होना!!!
धड़कते हुए बादलों की मस्तियों में बहने वाली तेज़ मूसलाधार बारिश भी चुभती है,
छील के रख देती है जिस्म मेरा,
लहूलुहान कर डालती है उसमें बसे तेरे मेरे लम्हों को,
जब तू पल भर के लिए भी अलग कर लेता है खुद को मेरे ख़यालों से।।।

याद है ना !!!

याद है ना?
कहा था तुमने कि ये सब रीत रीवाज और समाज के बंधन बस अब होंगे जीवन में just formality बनकर,
फिर क्यों अब इतनी बेचैनी, क्यों इतना उदासीपन,
क्यों इतना खालीपन खलने लगा है तुमको,
क्यों झनझना रहा है मन तुम्हारा
इन सबके चक्रव्यूह में फंसकर
जबकि आपस मे बंध गए हैं हम दोनों
जन्म जन्मांतर के लिये,युग युगान्तर तक।।

और क्या चाहिए!!!

पहले "मैं" इश्क़ में था
अब इश्क़ "मुझमें" है।।
और क्या चाहिए!!!
जिसे जीने की बस चाह थी
वो मुझमें ही समा गया।।
और क्या चाहिए!!!

अनदेखा !! अनसुना !!!

अनदेखा!!! अनसुना!!!
सकारात्मकता !!! नकारात्मकता !!!

क्या इन शब्दों से कुछ सीखने को मिलता है?
मेरा जवाब है "हाँजी"
कि कोई देखे या अनदेखा करदे,
कोई सुने या अनसुना करदे,
आप अपना कर्म ज़रूर पूरा कीजिये।
सृष्टि की हर वस्तु में सकारात्मकता और नकारात्मकता दोनों छुपे हैं,
आप क्या ढूंढते हैं,ये आप पर निर्भर है।।

सफ़र ख़त्म होने को है

और कितना दूर भागूँ मैं तुझसे?
अब तो रास्ता भी ख़त्म होने को है।।
और कितना जागूँ मैं रात भर?
अब तो अंधेरा भी ख़त्म होने को है।।
और कितना याद करूँ मैं तुझे?
अब तो याददाश्त भी धूमिल होने को है।।
और कितना करूँ इंतज़ार तेरा?
अब तो वक़्त भी ख़त्म होने को है।।
और कितनी आहें भरूँ मैं तेरे लिये?
अब तो साँसें भी ख़त्म होने को हैं।।
और कितना चलूँ मैं तेरे बिन?
अब तो सफ़र भी ख़त्म होने को है।।

उम्र

आपकी ज़िंदगी मे तीन उम्रों के लोग होते हैं। एक आपसे बड़े,एक आपसे छोटे और एक आपके हमउम्र।
बड़ों से मिलता है आपको अनुभव, तज़ुर्बा।।
छोटों से आपको मिलता है जोश,ऊर्जा, जुनून।।
तो आपको हमउम्र से क्या मिलता है?
उनसे मिलता है साथ ज़िन्दगी भर का
जो बाकी दोनों उम्रों से मिले हर एहसास को हमारे साथ साथ लेकर चलने की कोशिशें करता रहता है,लगातार,उम्र भर के लिये।।

रंगरेज़

ओढ़ कर हर रंग मेरा,
वो भी रंगरेज़ हो गया।।
कि वो दिखता भी मुझसा है,
वो बोलता भी मुझसा है,
वो चलता भी मुझसा ही,
और गुनगुनाता भी मुझसा ही है,
हर रंग उसका अब मुझसे ही
रहता है साये की तरह हर वक़्त संग मेरे,
मैं ख़ुश सूरज सा,तो वो बन मेरी परछाई
झूमता नज़र आये
और मैं उदास शाम ,तो भी अँधेरों में समा जाये।
पहले मैं रंगरेज़ था अकेला ही,
ओढ़ कर हर रंग मेरा,
वो भी रंगरेज़ हो गया।।

बस इतना सा और कहूँ

तेरे मेरे बीच कोई दीवार नहीं, कोई दरार नहीं
मैं और तू,किसी भी ग़लतफ़हमी का शिकार नहीं
तू है ना मेरा !!मुझे किसी और की दरकार नहीं
अब यही ज़रिया है कि मैं लिखूं
और करूँ तुझसे ही हर बात
वरना हर बात लिखने को तो
मेरा दिल भी तैयार नहीं
तू मुझे समझता है,और मैं तुझे,
मेरी नज़र में हमसे ज्यादा
कोई और समझदार नहीं
बस इतना सा और कहूँ, कि
तेरे सिवा अब और किसी से प्यार नहीं !!!

रहम कर मालिक

ए ख़ुदा !
राज़ी हूँ मैं , जो भी है तेरी रज़ा
ना जाने इसमें भी क्या है "भला"(भलाई) छुपा
मैं तो इंसान मात्र हूँ , बस प्रेम की भाषा समझूँ
कैसे सहूँ इतना सब , कोई तो इलाज बता
मेरा यक़ीन ,मेरा भरोसा एकदम से रहा डगमगा
आँखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा
ना जाने क्यूँ अचानक सब याद आने लगा
ज़बाँ ख़ामोश , सूखे होंठ ,नयन हो गए गीले
ऐसे में तू ही बता, कोई कैसे जीले?
अब तो बस एकमात्र विकल्प यही है कि
देखना भर रह गया है
कि तेरी रज़ा में और बुलंद होगा मेरा विश्वास
या फिर मेरी इबादतों से तू बदल डालेगा अपनी रज़ा।।
रहम कर मालिक ! रहम कर !!

सुनो !! एक काम करना !!!

सुनो !! एक काम करना !!!
मेरी ख़ातिर अपना ख़्याल रखना
मैं कुछ भी लिखूं,पर तुम प्यार ही देखना
मैं चाहे तुम्हें देखूं, पर तुम संसार देखना
हाँ संसार देखना,पर मुझमें ही हर बार देखना
संसार देखना केवल अपने मन की आँखों से
परेशान मत होना कभी दुनिया की बातों से
नई उम्मीद से ही हर नये दिन की शुरुआत करना
और हर पल हर ख़ुशी को अपनी बाहों में भरना
आने वाला कल बस तुम्हारा है
जिसे ख़ुदा ने सिर्फ़ तुम्हारे लिए सँवारा है
यही जुनून अपने ज़ेहन में रखना
अपनी हर ज़िद को हक़ीक़त में बदलना
मेरी परवाह मत करना ,बिन तुम्हारे रह लूँगा
तुम्हारे लिये, तुम्हारी जुदाई भी हंसके सह लूँगा
इस जन्म तेरा साथ हाथ की लकीरों में नहीं
बस यही सोचकर चुपचाप जियूँगा ज़िन्दगी
मगर हर घड़ी अब इंतज़ार बस तुम्हारा रहेगा
ये प्यार तुमसे था,तुमसे है और तुमसे ही रहेगा !!

अमर प्रेम

अमर प्रेम !!
प्रेम इक दिया , मैं बाती , तू रोशनी
मैं जलूं , तू फैल जाये
जिस तरह रोशनी के लिये दीये की बाती को जलना पड़ता है,
उसी तरह तेरे लिये जल रहा हूँ मैं,
और हो रहा है भावनात्मक सृजन
असंख्य रचनाओं का इस अमृत मंथन में,
जिसका केंद्र बिंदु भी तू है,
रोशनी चहुँ ओर , पथ प्रदर्शक साकार रूप
हर दिशा , हर मंज़िल , हर रास्ता
तू , तेरा , तेरे कारण ,तेरे ही लिये
मैं जलूं , तू जगमगाये
मैं जलूं , तू जगमगाये !!!

क्षमा याचना

क्यों?
क्यों नहीं है मन मेरा शांत, स्थिर और मौन ?
क्यों है नदी इच्छाओं की निरंतर बहती हुई सी ?
क्यों प्रयास हैं जारी हर समय तुझसे मिलन के ?
क्यों है तड़प तुझे मात्र निहारने भर की हर समय ही ?
क्यों हैं बंधन मोहपाश स्वरूप हर समय बंधे रहने के ?

जब ईश्वर संग प्रेम में तृष्णाओं के तूफान नहीं,
तो तुझ संग प्रेम में इतना स्वार्थ क्यों ?

तू भी तो उसी का ही रूप है,
उसकी हर रहमत से नवाज़ा हुआ ,उसी का उपहार
जो मिला है मुझे उसी द्वारा स्वयं को सँवारने के लिये।।
शायद मेरी ही श्रद्धा में है कमी बस इतनी भर सी,
कि उसमें और तुझमें फ़र्क समझ बैठा।
उसे प्रेम और तुझे ईश्वर समझूँ ,तो ही बनूं इस उपहार के लायक।।
बस यही है प्रार्थना,क्षमा याचना करूँ क्षमा याचना !!!

मेरे मन !! ज़रा ध्यान से सुन !!!

मेरे मन !! ज़रा ध्यान से सुन !!!
मत कर कोशिशें ख़ुश रहने की
तैयार कर स्वयं को सुख के ही सफ़र में
आने वाले दुख का सामना करने के लिए बेबाक होकर,
हर ख़ुशी को समझ ख़ुश हवाओं का सानिध्य,
और हर दुःख को समझ
आने वाली ख़ुशियों से पहले का मात्र एक पल,
मत कर कोशिशें समय को बांधने की,
क्योंकि जिसने समय को बांधना चाहा,
समय ने उसे ही हालात में जकड़ डाला,
खुल कर जी हर लम्हा,उत्सव मना ज़िन्दगी का
और डूब जा जीवंत क्रीड़ाओं के जश्न में,
मत ढूंढ कोई भी वजह जीने की
के तेरे जीने की वजह ख़ुद तेरे अरमान हैं,
पलकें झुका, बंद कर आँखें, ज़रा सा दिल के पास ला,
जिसे तू ढूँढे, वो तो तेरे हृदय में ही विराजमान है।।
मेरे मन !! ज़रा ध्यान से सुन !!!

दिल और दिमाग

क्या कभी इस पर ग़ौर फ़रमाया ???
दिल और दिमाग
दोनों का काम करने का तरीक़ा
बिल्कुल एक दूजे से अलग
दिमाग से सोचा जा सकता है,
और दिल हमेशा चाहता है,
ना जाने कितनी बार सोचा है जब कुछ करने को
तो वो भी नहीं हुआ जो होना चाहिए था,
पर जब जब चाहा है पूरी शिद्दत और मन्नत से कुछ भी,
तो असम्भव को भी सम्भव होते हुए देखा है।
बस फिर सोचना क्या?
चाहते हैं ना जी जान से !! जो भी चाहिये !!

Friday, 28 June 2019

यूँ ही ना वक़्त ज़ाया करो - Vikas Relhan Vk


यूँ ही ना वक़्त ज़ाया करो
जहां क़द्र हो आपके एहसास की
बस वहीं दिल की बात सुनाया करो
हमसफ़र बनना कोई खाला जी का खेल नहीं
यूँ ही ना हर किसी से उम्मीद लगाया करो
मन्नत और मिन्नत वहीं करो
जहां पूरी होने की आस हो
यूँ ही किसी भी ग़ैर के लिये
रास्तों पर आंखें न गढाया करो
जो चले सिर्फ़ तुमसे ही मिलने के लिए
बस उसी के लिये नज़रें बिछाया करो
वो बैठा रहे चाहे मुँह फुलाकर दिन महीने और साल
तुम तो अच्छे इंसान हो,उसका हाल चाल ही पूछ आया करो
जितने भी हैं दगाबाज़ और मतलबपरस्त आसपास
अपने दिलो दिमाग से उनका सफाया करो
हर कोई मशगूल है अपना उल्लू सीधा करने में
तुम भी बस अपने काम में दिल लगाया करो
सब मतलब के यार हैं और हैं एहसान फ़रामोश
हर किसी को ना नेकी का पाठ पढ़ाया करो
बिकाऊ है दिल का बाज़ार और बोली लगती है ख़्वाबों की
तुम भी कभी कभी कुछ सपने बेच आया करो
हाथ न फैलाना पड़े किसी ग़रीब के भी आगे
कम से कम इतना तो रोज़ कमाया करो
कि मंज़िल तेरी राह तक रही है हर पल
इन्तज़ार में किसी के ना वक़्त गंवाया करो
जो दे दे सारे हक़ अपने दिल,जिस्म,जान और रूह के भी तुम्हें
उसके लिये तो जान पर भी खेल जाया करो
उसके लिये तो जान पर भी खेल जाया करो।।

Tuesday, 25 June 2019

गुरु और शिष्य

जिन्हें अपने पास बिठाकर एक एक सुर की समझ और गायकी दी हो,
हर वो चीज़ ,हर वो मंत्र सिखाया हो जो हमें हमारे गुरुजनों ने बड़े ही स्नेह और वात्सल्य से सिखाया,
जब वही शिष्य साथ खड़े होकर गाने लगें तो मन और आत्मा ख़ुशी से झूम उठते हैं,
बार बार दुआयें और आशीर्वाद बरसता है उनके लिए हृदय से,
और सर श्रद्धा से झुक जाता है अपने परमात्मा, अपने माता पिता और अपने गुरुजनों के प्रति,
जिन्होंने हमें इस काबिल बना दिया कि हम पीढ़ी दर पीढ़ी संगीत की सेवा करते जायें।।
गुरुजनों को कोटि कोटि नमन।।
संगीत को आगे सही दिशा में बढ़ाने वाले शिष्यों को प्यार और आशीर्वाद।।।
Vikas Relhan Vk

Thursday, 20 June 2019

Duniya aur tum | दुनिया और तुम | Vikas Relhan Vk

एक दुनिया वो, जो मुद्दतों से साथ होकर भी अपनी ना हो सकी,
और एक तुम हो , जो मुद्दतों बाद ज़िन्दगी में आई
और हमारी दुनिया ही बन गयी।

एक दुनिया वो , जिसकी वजह हम बने हमसे जुड़ी हर दुनिया से मिलाने में
और वो हमें ही दरकिनार कर,उनसे मिलती चली गई,

और एक तुम हो , जिसने अपनी हर दुनिया से नाता तोड़,हमें ही अपनी दुनिया बना लिया।

एक दुनिया वो, जो झूठ और नफ़रतों का सहारा लेकर सीढ़ियां चढ़ रही है,

और एक तुम हो , जो सच्चाई और प्रेम की मूरत है।

एक दुनिया वो, जो दिखती कुछ और,और दिखाती कुछ और है,
और एक तुम हो , जिसके पास हमें देखने के अलावा कुछ भी नहीं।

Wednesday, 19 June 2019

झरना - Vikas Relhan Vk

झरना

ये झरना कितना अजीब है
हर वक़्त रहता है बहने को तैयार
दौड़ता है हर पल बाहर की ओर
और करता हैं कोशिशें बिखर जाने की

उकसाता है कि टूट जाऊँ मैं
बिखर ही जाऊँ

लहरों सा इसका उछाल
उमड़ता है बार बार

झिंझोड़े सौ दफ़ा
हिलाये हज़ारों बार
मेरे दिल की हर दीवार
समझाऊं लाखों दफ़ा
नहीं मानने को तैयार

मगर
रोक के रखा है इसे
यही आस बस इक दिल मे लिये
कि जिस दिन भी तू मुझसे मिले
बहा दूंगा मैं ये झरना
तुमसे लगके गले

सम्भाल के रखा है इक इक कतरा इस झरने का
कहीं बह न जाएं मेरे जज़्बात भी
इन आँखों के झरने के साथ ही
ये झरना है मेरे आँसुओं का
जो बहता है बस तेरे लिए
चाहे हो ख़ुशी, या ग़म।।
Vikas Relhan Vk

Saturday, 18 May 2019

इश्क़ बनाम इंतज़ार-Vikas Relhan Vk

अभी अभी दरवाज़े की घण्टी बजी,
जाके देखा तो सामने इंतज़ार खड़ा था।
बेतहाशा हालत में,बेहाल,बाल बिखरे हुए,
होंठ सूखे,कपड़े बड़ी ही बुरी हालत में,
मैंने पूछा-ये क्या हाल बना रखा है?
उसने बड़ी ही नाराज़गी से जवाब दिया-
जनाब,ये सब आपका किया धरा है।
मैं हो होके थक गया, आप कर करके नहीं थके क्या?
ऐसा कौन है जिसके लिए इतना तड़पते रहते हो?
ऐसा क्या है उसमें कि हर पल करते रहते हो?
उसका और सिर्फ उसका इंतजार।।
मैने हँसकर कहा-ध्यान से सुन,
तेरा वजूद तभी है जब तक किसी से कोई बेपनाह महोब्बत करता रहेगा।।
जिस दिन महोब्बत ख़त्म ,तेरा अस्तित्व भी ख़त्म।।
और इश्क़ में अगर तुझे ना किया तो मज़ा ही कुछ नहीं।।
इंतज़ार ने हँसकर कहा-
जनाब,अति हर चीज़ की बुरी होती है,चाहे फिर वो इंतज़ार ही क्यों ना हो।।
ऐसा ना हो कि करते करते सांस ही थम जाये।
फिर ना मैं रहूंगा,ना इश्क़,ना आप।
बस वो ही रहेगा
जिसका आप करते रहे
आखिरी सांस तक इंतज़ार।।
......….......
मैं चुप था,कोई जवाब नहीं था मेरे पास इंतज़ार की इस बात का,
चुपचाप ही दरवाज़ा बन्द करके मैं लौट आया और मौन रहा काफ़ी देर तक।।
और इंतज़ार,,,,
निकल पड़ा था फिर से भटकने किसी की यादों में उम्मीदों का सहारा लेकर फिर से एक अंजान सफ़र पर, जिनका शायद कोई अंत ना कभी था,
और ना कभी होगा।।
क्योंकि ना इस दुनिया से कभी इश्क़ रुख़सत होगा,
ना ही कभी इंतज़ार ख़त्म होगा।।
रुख़सत होंगे तो बस मैं और आप।।

Wednesday, 10 April 2019

ख़त-रूह से रूह तक - Vikas Relhan Vk

*ख़त-रूह से रूह तक*

*माना कि बहुत व्यस्त हो तुम*
*मग़र हम भी कुछ कम व्यस्त नहीं*
*शायद तुमसे कहीं ज्यादा ही होंगे*
*पर एक बात हमेशा याद रखना*
*समय रहते सम्भाल लो हाथों से रेत की तरह फिसलते रिश्तों को*
*कहीं ऐसा ना हो कि जब तुम्हें फ़ुरसत मिले और तुम हमें ढूँढो तो हम कहीं नज़र ही ना आयें*

*कहीं वक़्त का दरिया बहाकर ना ले जाये रिश्तों की रेत को अपने संग दूर तलक*

*कहीं परिस्थितियों की आँधियाँ छिन्न-भिन्न ना करदें हमारी खुशियों का आशियाना*

*कहीं साँसों की डोर ही न टूट जाये तुम्हारी धड़कनों को सुनने के इंतज़ार में*

*बस इतना ख़्याल रखना*
*जल्दी लौट कर आना*

*तुम्हारे इंतज़ार में-तुम्हारी रूह*

Tuesday, 9 April 2019

मैंने जिया है - Vikas Relhan Vk

*मैंने जिया है अपने ख़्वाबों की सूरत को,*
*मैंने पाया है उसका स्नेह अपार,*
*पाया है उससे सम्मान भी*
*हुआ उसकी एक एक साँस का हक़दार*
*स्वाभिमान बना मैं उसका*
*किया उसने अपने दुलार से सरोबार*
*मंगलसूत्र के रूप में उसने मुझे बांध लिया*
*और मैं बना उसके गले का हार*
*एक दूजे की उंगलियों को सजाया है हमने*
*बनकर अंगूठियों का हार श्रृंगार*
*सातों वचन और रस्में निभाई हैं*
*रखा है अपने एक एक पल से सरोकार*
*प्रेम आलिंगन से तृप्त हुए दोनों*
*ज़मीन से आसमां तक बस प्यार की ही बौछार*
*और वादा किया है साथ चलने का*
*एक दूसरे से ही होंगे सब वार-त्यौहार*
*बस अब इतनी सी तमन्ना है*
*जितनी दफा भी जन्म लूँ इस धरती पर*
*वही हो मेरा हमसफ़र हर बार*
*संग रहें हम जन्मों जनम तक*
*हर बार पहले से हो कहीं ज़्यादा प्यार*
*बेशुमार,बारम्बार, हर बार, बार बार*

तस्वीर ख़्वाबों की - Picture of Dreams - Vikas Relhan Vk

*हर इंसान के ज़ेहन में, ख़यालों में, सपनों में, ख़्वाबों में एक तस्वीर होती है जिसे वो जीना चाहता है।हक़ीक़त में बदलना चाहता है उस चेहरे को जिसे वो ख़्वाबों में जीता है।ढूंढता रहता है,तलाशता रहता है,भटकता रहता है बस अपनी उस एक सपनों की तस्वीर को देखने के लिए।कई बार तो उम्र ही निकल जाती है,मग़र नहीं हो पाता वैसा,जैसा वो चाहता है।*
*और जब तक ऐसा नहीं हो जाता,बार बार जन्म लेना पड़ता है उस ख़्वाब को हक़ीक़त में जीने के लिए,लेकिन हर बार उसका ख़्वाब और और ख़ूबसूरत होता चला जाता है,तड़प बढ़ती जाती है,उत्सुकता चरम सीमा पर पहुंचती जाती है।।*

*शायद ये ज़रूरी होता होगा उसकी हर कमी को दूर करने के लिए ताकि उसकी ये तड़प, उत्सुकता, तपस्या परिपूर्णता के उस मुक़ाम तक पहुंच जाए कि शक़ या सवाल की कोई गुंजाइश ही ना रहे कि क्यों इतनी बेचैनी और तड़प अपने ख़्वाब के लिए*।।

*शायद ये ज़रूरी होता होगा उसके प्यार और समर्पण को और गहरी समझ और सहजता प्रदान करने के लिए*।।

*शायद ये परीक्षा होती होगी भगवान के उन सब नियमों से परे,उसी के द्वारा सब नियम,सब कानून तोड़कर उस ख़्वाब को जीने की इच्छा रखने वाले के लिए ताकि परख सके भगवान उसे भी कि क्या ये हर कसौटी पर खरा उतरता भी है या नहीं।।*

*तब जाकर मिलता है उस अपने ख़्वाब को देखने,समझने और जीने का भी हक़।।*

*और जिसे वो अपना ख्वाब मिल जाये उसका जीवन फिर कैसा होता होगा,इसका अंदाज़ा भर लगाने से अजीब सी ख़ुशी और प्रसन्नता का अनुभव हम करते हैं,और कहते हैं अक्सर कि कितनी अच्छी किस्मत है अपने ख़्वाबों की तस्वीर से रु-ब-रु भी हुआ,और उसका प्यार भी पा  लिया।।*

*वरदान है उस परमात्मा का अपने ख़्वाब को जीने का हक़ मिल जाना।।*

*और ये उसी को नसीब होता है जो अपने नसीब को ईमानदारी और सच्ची नेक नियत से बनाने सँवारने निखारने का प्रण लेता है और रहता है हरदम उसके लिए समर्पण भाव में।।*

*तब जाकर कहीं पूर्ण होता है उसके जीवन -मृत्यु के आवागमन का चक्र और मिलता है मोक्ष ,और हो जाता है रूह से रूह का मिलन।।*

Thursday, 4 April 2019

Adhoori Kitaab - Vikas Relhan Vk

आधी अधूरी सी रही है ज़िन्दगी की किताब जीवन के प्रारम्भ से ही
हर मोड़ पर जुड़ता गया एक नया कोरा पन्ना
और चलता रहा यही सिलसिला
कभी किताब भरने सी लगी तो फटते, मिटते,धुंधले से होते चले गए वो पन्ने
जो जुड़े थे उस किताब से किसी न किसी मोड़ पर
कभी परिस्थितियों के चलते तो कभी अपनी मनमर्ज़ीयों के ग़ुलाम
कभी किसी न किसी मोह के वशीभूत होकर किया उस किताब को हर बार छलनी
हर बार लहूलुहान
हर बार सीना छील दिया विरह की तेजधार आरी से अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण रूप देने के लिए
हर बार ख़ून के आंसू रुलाये
वक़्त की तेज़ कटार काटती रही उसके कवर को भी जो रहता था सदैव रक्षात्मक अवस्था में अपने हर पन्ने के लिए
क्योंकि जानता था कि
वो पन्ने जिन पर लिखा गया है
एक एक सुर ज़िन्दगी का
एक एक सरगम भावनाओं की
एक एक अलाप संवेदनाओं का
एक एक तान रूहदारी की
वो मिटने ना पाए विकट से विकट परिस्थितियों में भी
लेकिन उसे क्या मालूम कि जब जुदाई की सुनामी आती है तो गहरे से गहरे रिश्ते को भी बहा कर ले जाती है अंधेरे समंदर की उस गहराई में जहां से निकल कर वापिस अपनी किताब में आकर जुड़ जाना शायद ही किसी पन्ने के लिए संभव हो

जिंदगी हर पल सिखाती है कि भावनाओं के सागर में बहना उचित नहीं
उसकी गहराई को समझना जरूरी है
और हम हर बार अपनी आदतों से मजबूर
बार बार हर बार उसी अंधेरे समंदर में गिरते हैं
हर बार उसी सुनामी का शिकार होते हैं
जो कर देती है हर बार घायल अपने बाज़ जैसे पंजों से
फिर कोई रहमा बनकर आ जाता है और मन फिर उसके बहाव में बहने लगे जाता है,
मुस्कुराता है,खिलखिलाता है,चहकता है
और फिर से संजोने लगता है सपने उस रहमा रूपी पन्ने पर नए सुर लिखने के
एक बार ये भूलकर की ये ज़िन्दगी की किताब है
अधूरी थी,अधूरी है और अधूरी ही रहेगी
फिर फटेगा कोई पन्ना
फिर होगा सब फिर से वही
पर मन तो बावरा है ना
समझता नहीं - Vikas Relhan Vk