Wednesday, 10 July 2019

सफ़र ख़त्म होने को है

और कितना दूर भागूँ मैं तुझसे?
अब तो रास्ता भी ख़त्म होने को है।।
और कितना जागूँ मैं रात भर?
अब तो अंधेरा भी ख़त्म होने को है।।
और कितना याद करूँ मैं तुझे?
अब तो याददाश्त भी धूमिल होने को है।।
और कितना करूँ इंतज़ार तेरा?
अब तो वक़्त भी ख़त्म होने को है।।
और कितनी आहें भरूँ मैं तेरे लिये?
अब तो साँसें भी ख़त्म होने को हैं।।
और कितना चलूँ मैं तेरे बिन?
अब तो सफ़र भी ख़त्म होने को है।।

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