जीवन के इस मोड़ पर
जहां इस वक़्त खड़ा हूँ मैं
इस मनस्थिति के साथ
कि जीना बहुत मुश्किल है
बिन तुम्हारे
पिघल रहा हूँ किसी बर्फ़ की नदी की तरह
और बह रहा हूँ क़तरा क़तरा
उस बंजर ज़मीं पर
जिस पर जितना भी पानी उड़ेल दो
मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है
उगना उम्मीदों की फ़सल का
जल रहा हूँ उस ज्वालामुखी की तरह
जिसे ना कोई चिंगारी दिखाता है
और ना ही कोई मजबूर करता है
उगलने के लिए लावा
बस वो जलता है अपने ही अंदर के ऊष्म मंथन से
भड़कता है अपने ही अंदर की आग से
लपटें उठाता है अपनी ही गर्मी से
और जला डालता है अपने साथ साथ
हर सामने आने वाली
दुनियावी चीज़ों को भी
इस दुनिया में कोई भी
इस बात के लिए नहीं होगा राज़ी
कि किसी की भी वजह से
मैं पिघलता रहा
और जलता रहा
क्योंकि हर कोई मशगूल है
अपनी अपनी दुनिया को सजाने में
हर कोई है व्यस्त
अपनी अपनी ज़रूरतों को पूरा करने में
क्यों लेगा ऐसे में कोई
मेरी तक़लीफ़ों की ज़िम्मेदारी
बस अब थकने सा लगा हूँ
धैर्य साथ छोड़ने लगा है
सब्र गिरने सा लगा है शायद
सम्भलना चाहता हूँ
जीना चाहता हूँ
खुश रहना चाहता हूँ
काश!!! कि कोई उम्रदराज़ आकर
दे दे मुझे अनुभव अपना
कि क्या होता है इसके बाद?
कौनसा होगा अगला पड़ाव?
कैसी होगी मन की स्थिति?
और कितना हो जाएगा परिपक्व मन?
जब ये सब होता है महसूस
ज़िन्दगी के सफ़र में
क्योंकि उनसे बेहतर कौन जानेगा?
उनसे बेहतर कौन समझेगा?
मेरे मन की पीड़ा!!!
मेरे मन की पीड़ा!!!
काश!!!!!
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