पता ही नहीं चला कि वक़्त कब गुज़र गया
कि अभी जैसे कल की ही तो बात थी
ख़त्म सा हो चला सफ़र तुम संग
पर मानो अभी ताज़ा ताज़ा ही तो मुलाकात थी
इस कदर खो सा गया था मैं तुम्हारी धुन में
कि कोई और आवाज़ जैसे सुनाई देना ही बंद हो गई
तुम्हारी धुन में ही तो वो जादू चला
कि मेरी दुनिया इक हुजूम से चंद हो गई
असर तुम्हारी धुन का अब तक छाया है मुझपर
कि होश में आने की अब चाह ही ना रही
पर ये वक़्त इतना ज़ालिम है कि बजा रहा लगातार अपनी ही शहनाई
कि इसकी धुन के आगे दुनिया का पत्ता पत्ता नाचने को मजबूर
मैं कैसे समझूँ महफूज़ ख़ुद को, कैसे करूँ महसूस तुम्हें
क्योंकि लगातार झिंझोड़े जा रहा इसका बेसुरापन मेरे मन को
जो मोहित और मदहोश है,तुम्हारी धुन में।।
Wednesday, 28 August 2019
तुम्हारी धुन में - Vk
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