Wednesday, 10 April 2019

ख़त-रूह से रूह तक - Vikas Relhan Vk

*ख़त-रूह से रूह तक*

*माना कि बहुत व्यस्त हो तुम*
*मग़र हम भी कुछ कम व्यस्त नहीं*
*शायद तुमसे कहीं ज्यादा ही होंगे*
*पर एक बात हमेशा याद रखना*
*समय रहते सम्भाल लो हाथों से रेत की तरह फिसलते रिश्तों को*
*कहीं ऐसा ना हो कि जब तुम्हें फ़ुरसत मिले और तुम हमें ढूँढो तो हम कहीं नज़र ही ना आयें*

*कहीं वक़्त का दरिया बहाकर ना ले जाये रिश्तों की रेत को अपने संग दूर तलक*

*कहीं परिस्थितियों की आँधियाँ छिन्न-भिन्न ना करदें हमारी खुशियों का आशियाना*

*कहीं साँसों की डोर ही न टूट जाये तुम्हारी धड़कनों को सुनने के इंतज़ार में*

*बस इतना ख़्याल रखना*
*जल्दी लौट कर आना*

*तुम्हारे इंतज़ार में-तुम्हारी रूह*

No comments:

Post a Comment