आधी अधूरी सी रही है ज़िन्दगी की किताब जीवन के प्रारम्भ से ही
हर मोड़ पर जुड़ता गया एक नया कोरा पन्ना
और चलता रहा यही सिलसिला
कभी किताब भरने सी लगी तो फटते, मिटते,धुंधले से होते चले गए वो पन्ने
जो जुड़े थे उस किताब से किसी न किसी मोड़ पर
कभी परिस्थितियों के चलते तो कभी अपनी मनमर्ज़ीयों के ग़ुलाम
कभी किसी न किसी मोह के वशीभूत होकर किया उस किताब को हर बार छलनी
हर बार लहूलुहान
हर बार सीना छील दिया विरह की तेजधार आरी से अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण रूप देने के लिए
हर बार ख़ून के आंसू रुलाये
वक़्त की तेज़ कटार काटती रही उसके कवर को भी जो रहता था सदैव रक्षात्मक अवस्था में अपने हर पन्ने के लिए
क्योंकि जानता था कि
वो पन्ने जिन पर लिखा गया है
एक एक सुर ज़िन्दगी का
एक एक सरगम भावनाओं की
एक एक अलाप संवेदनाओं का
एक एक तान रूहदारी की
वो मिटने ना पाए विकट से विकट परिस्थितियों में भी
लेकिन उसे क्या मालूम कि जब जुदाई की सुनामी आती है तो गहरे से गहरे रिश्ते को भी बहा कर ले जाती है अंधेरे समंदर की उस गहराई में जहां से निकल कर वापिस अपनी किताब में आकर जुड़ जाना शायद ही किसी पन्ने के लिए संभव हो
जिंदगी हर पल सिखाती है कि भावनाओं के सागर में बहना उचित नहीं
उसकी गहराई को समझना जरूरी है
और हम हर बार अपनी आदतों से मजबूर
बार बार हर बार उसी अंधेरे समंदर में गिरते हैं
हर बार उसी सुनामी का शिकार होते हैं
जो कर देती है हर बार घायल अपने बाज़ जैसे पंजों से
फिर कोई रहमा बनकर आ जाता है और मन फिर उसके बहाव में बहने लगे जाता है,
मुस्कुराता है,खिलखिलाता है,चहकता है
और फिर से संजोने लगता है सपने उस रहमा रूपी पन्ने पर नए सुर लिखने के
एक बार ये भूलकर की ये ज़िन्दगी की किताब है
अधूरी थी,अधूरी है और अधूरी ही रहेगी
फिर फटेगा कोई पन्ना
फिर होगा सब फिर से वही
पर मन तो बावरा है ना
समझता नहीं - Vikas Relhan Vk
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