Wednesday, 10 July 2019

अमर प्रेम

अमर प्रेम !!
प्रेम इक दिया , मैं बाती , तू रोशनी
मैं जलूं , तू फैल जाये
जिस तरह रोशनी के लिये दीये की बाती को जलना पड़ता है,
उसी तरह तेरे लिये जल रहा हूँ मैं,
और हो रहा है भावनात्मक सृजन
असंख्य रचनाओं का इस अमृत मंथन में,
जिसका केंद्र बिंदु भी तू है,
रोशनी चहुँ ओर , पथ प्रदर्शक साकार रूप
हर दिशा , हर मंज़िल , हर रास्ता
तू , तेरा , तेरे कारण ,तेरे ही लिये
मैं जलूं , तू जगमगाये
मैं जलूं , तू जगमगाये !!!

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