क्यों?
क्यों नहीं है मन मेरा शांत, स्थिर और मौन ?
क्यों है नदी इच्छाओं की निरंतर बहती हुई सी ?
क्यों प्रयास हैं जारी हर समय तुझसे मिलन के ?
क्यों है तड़प तुझे मात्र निहारने भर की हर समय ही ?
क्यों हैं बंधन मोहपाश स्वरूप हर समय बंधे रहने के ?
जब ईश्वर संग प्रेम में तृष्णाओं के तूफान नहीं,
तो तुझ संग प्रेम में इतना स्वार्थ क्यों ?
तू भी तो उसी का ही रूप है,
उसकी हर रहमत से नवाज़ा हुआ ,उसी का उपहार
जो मिला है मुझे उसी द्वारा स्वयं को सँवारने के लिये।।
शायद मेरी ही श्रद्धा में है कमी बस इतनी भर सी,
कि उसमें और तुझमें फ़र्क समझ बैठा।
उसे प्रेम और तुझे ईश्वर समझूँ ,तो ही बनूं इस उपहार के लायक।।
बस यही है प्रार्थना,क्षमा याचना करूँ क्षमा याचना !!!
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