नयी मंज़िलों की तरफ बढ़ने को
बेताब हैं मेरे कदम
मग़र रास्तों को गवारा नहीं
कि उनके सिवा कोई और
मंज़िलों की दहलीज को छुये।।
आसमाँ छूने को तैयार हैं ये हाथ मेरे
मग़र हवाओं को मंज़ूर नहीं
कि उनके सिवा कोई और
ऊँचाइयों को महसूस करे।।
समंदर की गहराई में
गोते लगाने को तैयार है
ये मन मेरा मग़र
लहरों को बर्दाश्त नहीं
कि उनके सिवा कोई और
पानी की गहराई को समझे।।
जब वजूद ही हाथ छोड़ दे
तो कुदरत क्या और किस्मत क्या???
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