Wednesday, 19 June 2019

झरना - Vikas Relhan Vk

झरना

ये झरना कितना अजीब है
हर वक़्त रहता है बहने को तैयार
दौड़ता है हर पल बाहर की ओर
और करता हैं कोशिशें बिखर जाने की

उकसाता है कि टूट जाऊँ मैं
बिखर ही जाऊँ

लहरों सा इसका उछाल
उमड़ता है बार बार

झिंझोड़े सौ दफ़ा
हिलाये हज़ारों बार
मेरे दिल की हर दीवार
समझाऊं लाखों दफ़ा
नहीं मानने को तैयार

मगर
रोक के रखा है इसे
यही आस बस इक दिल मे लिये
कि जिस दिन भी तू मुझसे मिले
बहा दूंगा मैं ये झरना
तुमसे लगके गले

सम्भाल के रखा है इक इक कतरा इस झरने का
कहीं बह न जाएं मेरे जज़्बात भी
इन आँखों के झरने के साथ ही
ये झरना है मेरे आँसुओं का
जो बहता है बस तेरे लिए
चाहे हो ख़ुशी, या ग़म।।
Vikas Relhan Vk

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