झरना
ये झरना कितना अजीब है
हर वक़्त रहता है बहने को तैयार
दौड़ता है हर पल बाहर की ओर
और करता हैं कोशिशें बिखर जाने की
उकसाता है कि टूट जाऊँ मैं
बिखर ही जाऊँ
लहरों सा इसका उछाल
उमड़ता है बार बार
झिंझोड़े सौ दफ़ा
हिलाये हज़ारों बार
मेरे दिल की हर दीवार
समझाऊं लाखों दफ़ा
नहीं मानने को तैयार
मगर
रोक के रखा है इसे
यही आस बस इक दिल मे लिये
कि जिस दिन भी तू मुझसे मिले
बहा दूंगा मैं ये झरना
तुमसे लगके गले
सम्भाल के रखा है इक इक कतरा इस झरने का
कहीं बह न जाएं मेरे जज़्बात भी
इन आँखों के झरने के साथ ही
ये झरना है मेरे आँसुओं का
जो बहता है बस तेरे लिए
चाहे हो ख़ुशी, या ग़म।।
Vikas Relhan Vk
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