सबकुछ पिघलता रहता है ,
बुराई,छल,कपट,द्वेष,ईर्ष्या,क्रोध,अहंकार
और बहता रहता है
इस मन के कुरूप ज्वालामुखी से
झूठ का लावा बनकर,
और जब ये लावा पूरी तरह से फैल जाता है
मानवीयता और इंसानियत की धरती पर और
उसके अंग प्रत्यंग को जलाना आरम्भ कर देता है,
तब आसमान से फव्वारा छूटता है पश्चाताप का,
नदियाँ बहती हैं प्रार्थनाओं की,
समन्दर बनते हैं प्रायश्चित के,
और कर देते हैं ठंडा उस लावे को
और निकलता है उसमें से
ईमान,वफ़ादारी,प्यार,दोस्ती,
रिश्ते,अच्छाई,नेकी, समर्पण का सोना,
मानव के साथ साथ इस पूरी सृष्टि को
एक नई चमक देने के लिये
ये चक्र यूँ ही चलता रहता है ,
कभी लावा जल्दी पिघल जाता है
तो कभी बारिश जल्दी हो जाती है
पर होता रहता यही,यहीं सबकुछ है,
यही जीवन है ।।।
Saturday, 23 June 2018
यही जीवन है by Vikas Relhan Vk
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