जब तुम नहीं होती
समझ नहीं आ रहा कि क्या कहूँ,
मतलब कि तुम होती हो तो सुकून सा रहता है,
और जब तुम नहीं होती तो ऐसा लगता है जैसे साँसों में बर्फ़ सी जम गयी हो,इंतज़ार में उस धूप की जो उसे फिर से पिघला कर ख़ुद में समा ले
शरीर पतझड़ सा लगे,इंतज़ार उस सावन का जो उसे फिर से हरा भरा करदे
बेज़ुबान सी आँखें चाहत उस नमी की जो इन नम आँखों अपनी नमी से नम करदे
ख़ामोश सी मुस्कुराहटें और किसी बंजर सी ज़मीं से लब,सूखते हुये समन्दर की तरह तलाश में प्यार की कस्तूरी की जो मृगनयनी के ही पास है
हाथ जैसे कांपते हुए छूने को बेताब तुम्हें और पाने को स्पर्श तुम्हारे प्रेम का
आत्मा जैसे बिन पानी मछली की तरह तड़पती हुई,
बेचैन हो जैसे पाने को अपना गीला संसार
जिस्म जैसे जिस्म नहीं कोई बेजान सी मूरत हो जैसे
परछाई के रूप में तुम्हें खोजती हुई
तलाश में अपने साये की जो कि तुम हो
कुछ समझ नहीं आ रहा कि और क्या कहूँ
बस इतना ही कि हर पल मुझे करना है बस यही
सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा इंतज़ार
इंतज़ार और सिर्फ़ तुम्हारा इंतज़ार
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