रे मन !
क्यूँ भागे तू ???
अपने ही ख्वाबों के पीछे
क्यूँ हर समय अपनी ही नींद को सींचे
क्यूँ नहीं तू अपने ही बस में
क्या दौड़ता है आखिर तेरी नस नस में
क्यूँ न समझे तू कि सपना है आख़िर बर्फ़ का टुकड़ा
जिसकी हक़ीक़त पिघलना है , जमे रहना नहीं
क्यूँ न समझे कि ख़्वाब हैं आख़िर बुलबुला पानी का
जो फूट जाए अगले ही पल बिना किसी वजूद के
अगर ख़्वाब और सपने देखने ही हैं तो त्याग दे चैन की नींद और आराम का सुख
क्योंकि ख़्वाब और सपने वो नहीं जो सोकर देखे जाते हैं
ख़्वाब और सपने तो वो होते हैं जो सोने ही नहीं देते
जीना है तो किसी अपने के लिए जी,अपनों के लिए जी
अपने लिए जीना तो स्वार्थ है,और है मतलब परस्ती
और किसी अपने के लिए जीना ही है प्रेम,समर्पण, विश्वास और उम्मीद
और यही प्रेम,यही समर्पण,यही विश्वास और यही उम्मीद पहुंचाती है किसी भी ख़्वाब और सपने को हक़ीक़त तक
रे मन !!!
भाग !!!!!!
अपने सपनों के लिये नहीं, अपने अपनों के लिये !!!
Thursday, 21 June 2018
रे मन !!! By Vikas Relhan Vk
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