Saturday, 18 May 2019

इश्क़ बनाम इंतज़ार-Vikas Relhan Vk

अभी अभी दरवाज़े की घण्टी बजी,
जाके देखा तो सामने इंतज़ार खड़ा था।
बेतहाशा हालत में,बेहाल,बाल बिखरे हुए,
होंठ सूखे,कपड़े बड़ी ही बुरी हालत में,
मैंने पूछा-ये क्या हाल बना रखा है?
उसने बड़ी ही नाराज़गी से जवाब दिया-
जनाब,ये सब आपका किया धरा है।
मैं हो होके थक गया, आप कर करके नहीं थके क्या?
ऐसा कौन है जिसके लिए इतना तड़पते रहते हो?
ऐसा क्या है उसमें कि हर पल करते रहते हो?
उसका और सिर्फ उसका इंतजार।।
मैने हँसकर कहा-ध्यान से सुन,
तेरा वजूद तभी है जब तक किसी से कोई बेपनाह महोब्बत करता रहेगा।।
जिस दिन महोब्बत ख़त्म ,तेरा अस्तित्व भी ख़त्म।।
और इश्क़ में अगर तुझे ना किया तो मज़ा ही कुछ नहीं।।
इंतज़ार ने हँसकर कहा-
जनाब,अति हर चीज़ की बुरी होती है,चाहे फिर वो इंतज़ार ही क्यों ना हो।।
ऐसा ना हो कि करते करते सांस ही थम जाये।
फिर ना मैं रहूंगा,ना इश्क़,ना आप।
बस वो ही रहेगा
जिसका आप करते रहे
आखिरी सांस तक इंतज़ार।।
......….......
मैं चुप था,कोई जवाब नहीं था मेरे पास इंतज़ार की इस बात का,
चुपचाप ही दरवाज़ा बन्द करके मैं लौट आया और मौन रहा काफ़ी देर तक।।
और इंतज़ार,,,,
निकल पड़ा था फिर से भटकने किसी की यादों में उम्मीदों का सहारा लेकर फिर से एक अंजान सफ़र पर, जिनका शायद कोई अंत ना कभी था,
और ना कभी होगा।।
क्योंकि ना इस दुनिया से कभी इश्क़ रुख़सत होगा,
ना ही कभी इंतज़ार ख़त्म होगा।।
रुख़सत होंगे तो बस मैं और आप।।

Wednesday, 10 April 2019

ख़त-रूह से रूह तक - Vikas Relhan Vk

*ख़त-रूह से रूह तक*

*माना कि बहुत व्यस्त हो तुम*
*मग़र हम भी कुछ कम व्यस्त नहीं*
*शायद तुमसे कहीं ज्यादा ही होंगे*
*पर एक बात हमेशा याद रखना*
*समय रहते सम्भाल लो हाथों से रेत की तरह फिसलते रिश्तों को*
*कहीं ऐसा ना हो कि जब तुम्हें फ़ुरसत मिले और तुम हमें ढूँढो तो हम कहीं नज़र ही ना आयें*

*कहीं वक़्त का दरिया बहाकर ना ले जाये रिश्तों की रेत को अपने संग दूर तलक*

*कहीं परिस्थितियों की आँधियाँ छिन्न-भिन्न ना करदें हमारी खुशियों का आशियाना*

*कहीं साँसों की डोर ही न टूट जाये तुम्हारी धड़कनों को सुनने के इंतज़ार में*

*बस इतना ख़्याल रखना*
*जल्दी लौट कर आना*

*तुम्हारे इंतज़ार में-तुम्हारी रूह*

Tuesday, 9 April 2019

मैंने जिया है - Vikas Relhan Vk

*मैंने जिया है अपने ख़्वाबों की सूरत को,*
*मैंने पाया है उसका स्नेह अपार,*
*पाया है उससे सम्मान भी*
*हुआ उसकी एक एक साँस का हक़दार*
*स्वाभिमान बना मैं उसका*
*किया उसने अपने दुलार से सरोबार*
*मंगलसूत्र के रूप में उसने मुझे बांध लिया*
*और मैं बना उसके गले का हार*
*एक दूजे की उंगलियों को सजाया है हमने*
*बनकर अंगूठियों का हार श्रृंगार*
*सातों वचन और रस्में निभाई हैं*
*रखा है अपने एक एक पल से सरोकार*
*प्रेम आलिंगन से तृप्त हुए दोनों*
*ज़मीन से आसमां तक बस प्यार की ही बौछार*
*और वादा किया है साथ चलने का*
*एक दूसरे से ही होंगे सब वार-त्यौहार*
*बस अब इतनी सी तमन्ना है*
*जितनी दफा भी जन्म लूँ इस धरती पर*
*वही हो मेरा हमसफ़र हर बार*
*संग रहें हम जन्मों जनम तक*
*हर बार पहले से हो कहीं ज़्यादा प्यार*
*बेशुमार,बारम्बार, हर बार, बार बार*

तस्वीर ख़्वाबों की - Picture of Dreams - Vikas Relhan Vk

*हर इंसान के ज़ेहन में, ख़यालों में, सपनों में, ख़्वाबों में एक तस्वीर होती है जिसे वो जीना चाहता है।हक़ीक़त में बदलना चाहता है उस चेहरे को जिसे वो ख़्वाबों में जीता है।ढूंढता रहता है,तलाशता रहता है,भटकता रहता है बस अपनी उस एक सपनों की तस्वीर को देखने के लिए।कई बार तो उम्र ही निकल जाती है,मग़र नहीं हो पाता वैसा,जैसा वो चाहता है।*
*और जब तक ऐसा नहीं हो जाता,बार बार जन्म लेना पड़ता है उस ख़्वाब को हक़ीक़त में जीने के लिए,लेकिन हर बार उसका ख़्वाब और और ख़ूबसूरत होता चला जाता है,तड़प बढ़ती जाती है,उत्सुकता चरम सीमा पर पहुंचती जाती है।।*

*शायद ये ज़रूरी होता होगा उसकी हर कमी को दूर करने के लिए ताकि उसकी ये तड़प, उत्सुकता, तपस्या परिपूर्णता के उस मुक़ाम तक पहुंच जाए कि शक़ या सवाल की कोई गुंजाइश ही ना रहे कि क्यों इतनी बेचैनी और तड़प अपने ख़्वाब के लिए*।।

*शायद ये ज़रूरी होता होगा उसके प्यार और समर्पण को और गहरी समझ और सहजता प्रदान करने के लिए*।।

*शायद ये परीक्षा होती होगी भगवान के उन सब नियमों से परे,उसी के द्वारा सब नियम,सब कानून तोड़कर उस ख़्वाब को जीने की इच्छा रखने वाले के लिए ताकि परख सके भगवान उसे भी कि क्या ये हर कसौटी पर खरा उतरता भी है या नहीं।।*

*तब जाकर मिलता है उस अपने ख़्वाब को देखने,समझने और जीने का भी हक़।।*

*और जिसे वो अपना ख्वाब मिल जाये उसका जीवन फिर कैसा होता होगा,इसका अंदाज़ा भर लगाने से अजीब सी ख़ुशी और प्रसन्नता का अनुभव हम करते हैं,और कहते हैं अक्सर कि कितनी अच्छी किस्मत है अपने ख़्वाबों की तस्वीर से रु-ब-रु भी हुआ,और उसका प्यार भी पा  लिया।।*

*वरदान है उस परमात्मा का अपने ख़्वाब को जीने का हक़ मिल जाना।।*

*और ये उसी को नसीब होता है जो अपने नसीब को ईमानदारी और सच्ची नेक नियत से बनाने सँवारने निखारने का प्रण लेता है और रहता है हरदम उसके लिए समर्पण भाव में।।*

*तब जाकर कहीं पूर्ण होता है उसके जीवन -मृत्यु के आवागमन का चक्र और मिलता है मोक्ष ,और हो जाता है रूह से रूह का मिलन।।*

Thursday, 4 April 2019

Adhoori Kitaab - Vikas Relhan Vk

आधी अधूरी सी रही है ज़िन्दगी की किताब जीवन के प्रारम्भ से ही
हर मोड़ पर जुड़ता गया एक नया कोरा पन्ना
और चलता रहा यही सिलसिला
कभी किताब भरने सी लगी तो फटते, मिटते,धुंधले से होते चले गए वो पन्ने
जो जुड़े थे उस किताब से किसी न किसी मोड़ पर
कभी परिस्थितियों के चलते तो कभी अपनी मनमर्ज़ीयों के ग़ुलाम
कभी किसी न किसी मोह के वशीभूत होकर किया उस किताब को हर बार छलनी
हर बार लहूलुहान
हर बार सीना छील दिया विरह की तेजधार आरी से अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण रूप देने के लिए
हर बार ख़ून के आंसू रुलाये
वक़्त की तेज़ कटार काटती रही उसके कवर को भी जो रहता था सदैव रक्षात्मक अवस्था में अपने हर पन्ने के लिए
क्योंकि जानता था कि
वो पन्ने जिन पर लिखा गया है
एक एक सुर ज़िन्दगी का
एक एक सरगम भावनाओं की
एक एक अलाप संवेदनाओं का
एक एक तान रूहदारी की
वो मिटने ना पाए विकट से विकट परिस्थितियों में भी
लेकिन उसे क्या मालूम कि जब जुदाई की सुनामी आती है तो गहरे से गहरे रिश्ते को भी बहा कर ले जाती है अंधेरे समंदर की उस गहराई में जहां से निकल कर वापिस अपनी किताब में आकर जुड़ जाना शायद ही किसी पन्ने के लिए संभव हो

जिंदगी हर पल सिखाती है कि भावनाओं के सागर में बहना उचित नहीं
उसकी गहराई को समझना जरूरी है
और हम हर बार अपनी आदतों से मजबूर
बार बार हर बार उसी अंधेरे समंदर में गिरते हैं
हर बार उसी सुनामी का शिकार होते हैं
जो कर देती है हर बार घायल अपने बाज़ जैसे पंजों से
फिर कोई रहमा बनकर आ जाता है और मन फिर उसके बहाव में बहने लगे जाता है,
मुस्कुराता है,खिलखिलाता है,चहकता है
और फिर से संजोने लगता है सपने उस रहमा रूपी पन्ने पर नए सुर लिखने के
एक बार ये भूलकर की ये ज़िन्दगी की किताब है
अधूरी थी,अधूरी है और अधूरी ही रहेगी
फिर फटेगा कोई पन्ना
फिर होगा सब फिर से वही
पर मन तो बावरा है ना
समझता नहीं - Vikas Relhan Vk

Wednesday, 3 April 2019

Yahi to Hai Pyaar - Vikas Relhan Vk

*ना जाने कितनी ही बार तुझसे नाराज़ हो कर निकल गया मैं कितनी ही दूर ख्यालों ख्यालों में*
*बहुत बहुत दूर कई कई बार*
*ना जाने कितनी ही बार*
*मग़र घूम कर तुझ तक ही आ पहुंचा मैं हर बार*
*और पाया तुझे वहीं खड़े खड़े करते हुए मेरा इंतज़ार*
*लौटा मैं इक एहसास लिए हुए,एक पश्चाताप के साथ हर बार*
*कि घड़ी की दोनों सुईयों की मानिंद है अपना प्यार*
*रूठेगा भी,छूटेगा भी,टूटेगा भी,पर फिर से वहीं पर वैसा ही मिलन होगा दोनों का बार बार*
*इसी एहसास के साथ कि हम दोनों से ही है इक दूजे का वजूद*
*ना मेरे बिन तेरा पार*
*ना तेरे बिन मेरा पार*
*यही है प्यार,यही है प्यार*
*यही तो है प्यार*

Wednesday, 26 September 2018

मन की दशा

समझ सकता हूँ मैं तेरे मन की दशा
महसूस कर सकता हूँ तेरे अंदर की उथल पुथल
छू सकता हूँ तेरे संग बीते उन सब लम्हों को
बह रहा हूँ तेरे भावों के बहते सागर में
क्योंकि
जो तुझे अब महसूस हुआ है
मैं वो मंज़र सदियों से जी रहा हूँ
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