*हर इंसान के ज़ेहन में, ख़यालों में, सपनों में, ख़्वाबों में एक तस्वीर होती है जिसे वो जीना चाहता है।हक़ीक़त में बदलना चाहता है उस चेहरे को जिसे वो ख़्वाबों में जीता है।ढूंढता रहता है,तलाशता रहता है,भटकता रहता है बस अपनी उस एक सपनों की तस्वीर को देखने के लिए।कई बार तो उम्र ही निकल जाती है,मग़र नहीं हो पाता वैसा,जैसा वो चाहता है।*
*और जब तक ऐसा नहीं हो जाता,बार बार जन्म लेना पड़ता है उस ख़्वाब को हक़ीक़त में जीने के लिए,लेकिन हर बार उसका ख़्वाब और और ख़ूबसूरत होता चला जाता है,तड़प बढ़ती जाती है,उत्सुकता चरम सीमा पर पहुंचती जाती है।।*
*शायद ये ज़रूरी होता होगा उसकी हर कमी को दूर करने के लिए ताकि उसकी ये तड़प, उत्सुकता, तपस्या परिपूर्णता के उस मुक़ाम तक पहुंच जाए कि शक़ या सवाल की कोई गुंजाइश ही ना रहे कि क्यों इतनी बेचैनी और तड़प अपने ख़्वाब के लिए*।।
*शायद ये ज़रूरी होता होगा उसके प्यार और समर्पण को और गहरी समझ और सहजता प्रदान करने के लिए*।।
*शायद ये परीक्षा होती होगी भगवान के उन सब नियमों से परे,उसी के द्वारा सब नियम,सब कानून तोड़कर उस ख़्वाब को जीने की इच्छा रखने वाले के लिए ताकि परख सके भगवान उसे भी कि क्या ये हर कसौटी पर खरा उतरता भी है या नहीं।।*
*तब जाकर मिलता है उस अपने ख़्वाब को देखने,समझने और जीने का भी हक़।।*
*और जिसे वो अपना ख्वाब मिल जाये उसका जीवन फिर कैसा होता होगा,इसका अंदाज़ा भर लगाने से अजीब सी ख़ुशी और प्रसन्नता का अनुभव हम करते हैं,और कहते हैं अक्सर कि कितनी अच्छी किस्मत है अपने ख़्वाबों की तस्वीर से रु-ब-रु भी हुआ,और उसका प्यार भी पा लिया।।*
*वरदान है उस परमात्मा का अपने ख़्वाब को जीने का हक़ मिल जाना।।*
*और ये उसी को नसीब होता है जो अपने नसीब को ईमानदारी और सच्ची नेक नियत से बनाने सँवारने निखारने का प्रण लेता है और रहता है हरदम उसके लिए समर्पण भाव में।।*
*तब जाकर कहीं पूर्ण होता है उसके जीवन -मृत्यु के आवागमन का चक्र और मिलता है मोक्ष ,और हो जाता है रूह से रूह का मिलन।।*