तेरे मेरे बीच कोई दीवार नहीं, कोई दरार नहीं
मैं और तू,किसी भी ग़लतफ़हमी का शिकार नहीं
तू है ना मेरा !!मुझे किसी और की दरकार नहीं
अब यही ज़रिया है कि मैं लिखूं
और करूँ तुझसे ही हर बात
वरना हर बात लिखने को तो
मेरा दिल भी तैयार नहीं
तू मुझे समझता है,और मैं तुझे,
मेरी नज़र में हमसे ज्यादा
कोई और समझदार नहीं
बस इतना सा और कहूँ, कि
तेरे सिवा अब और किसी से प्यार नहीं !!!
Wednesday, 10 July 2019
बस इतना सा और कहूँ
रहम कर मालिक
ए ख़ुदा !
राज़ी हूँ मैं , जो भी है तेरी रज़ा
ना जाने इसमें भी क्या है "भला"(भलाई) छुपा
मैं तो इंसान मात्र हूँ , बस प्रेम की भाषा समझूँ
कैसे सहूँ इतना सब , कोई तो इलाज बता
मेरा यक़ीन ,मेरा भरोसा एकदम से रहा डगमगा
आँखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा
ना जाने क्यूँ अचानक सब याद आने लगा
ज़बाँ ख़ामोश , सूखे होंठ ,नयन हो गए गीले
ऐसे में तू ही बता, कोई कैसे जीले?
अब तो बस एकमात्र विकल्प यही है कि
देखना भर रह गया है
कि तेरी रज़ा में और बुलंद होगा मेरा विश्वास
या फिर मेरी इबादतों से तू बदल डालेगा अपनी रज़ा।।
रहम कर मालिक ! रहम कर !!
सुनो !! एक काम करना !!!
सुनो !! एक काम करना !!!
मेरी ख़ातिर अपना ख़्याल रखना
मैं कुछ भी लिखूं,पर तुम प्यार ही देखना
मैं चाहे तुम्हें देखूं, पर तुम संसार देखना
हाँ संसार देखना,पर मुझमें ही हर बार देखना
संसार देखना केवल अपने मन की आँखों से
परेशान मत होना कभी दुनिया की बातों से
नई उम्मीद से ही हर नये दिन की शुरुआत करना
और हर पल हर ख़ुशी को अपनी बाहों में भरना
आने वाला कल बस तुम्हारा है
जिसे ख़ुदा ने सिर्फ़ तुम्हारे लिए सँवारा है
यही जुनून अपने ज़ेहन में रखना
अपनी हर ज़िद को हक़ीक़त में बदलना
मेरी परवाह मत करना ,बिन तुम्हारे रह लूँगा
तुम्हारे लिये, तुम्हारी जुदाई भी हंसके सह लूँगा
इस जन्म तेरा साथ हाथ की लकीरों में नहीं
बस यही सोचकर चुपचाप जियूँगा ज़िन्दगी
मगर हर घड़ी अब इंतज़ार बस तुम्हारा रहेगा
ये प्यार तुमसे था,तुमसे है और तुमसे ही रहेगा !!
अमर प्रेम
अमर प्रेम !!
प्रेम इक दिया , मैं बाती , तू रोशनी
मैं जलूं , तू फैल जाये
जिस तरह रोशनी के लिये दीये की बाती को जलना पड़ता है,
उसी तरह तेरे लिये जल रहा हूँ मैं,
और हो रहा है भावनात्मक सृजन
असंख्य रचनाओं का इस अमृत मंथन में,
जिसका केंद्र बिंदु भी तू है,
रोशनी चहुँ ओर , पथ प्रदर्शक साकार रूप
हर दिशा , हर मंज़िल , हर रास्ता
तू , तेरा , तेरे कारण ,तेरे ही लिये
मैं जलूं , तू जगमगाये
मैं जलूं , तू जगमगाये !!!
क्षमा याचना
क्यों?
क्यों नहीं है मन मेरा शांत, स्थिर और मौन ?
क्यों है नदी इच्छाओं की निरंतर बहती हुई सी ?
क्यों प्रयास हैं जारी हर समय तुझसे मिलन के ?
क्यों है तड़प तुझे मात्र निहारने भर की हर समय ही ?
क्यों हैं बंधन मोहपाश स्वरूप हर समय बंधे रहने के ?
जब ईश्वर संग प्रेम में तृष्णाओं के तूफान नहीं,
तो तुझ संग प्रेम में इतना स्वार्थ क्यों ?
तू भी तो उसी का ही रूप है,
उसकी हर रहमत से नवाज़ा हुआ ,उसी का उपहार
जो मिला है मुझे उसी द्वारा स्वयं को सँवारने के लिये।।
शायद मेरी ही श्रद्धा में है कमी बस इतनी भर सी,
कि उसमें और तुझमें फ़र्क समझ बैठा।
उसे प्रेम और तुझे ईश्वर समझूँ ,तो ही बनूं इस उपहार के लायक।।
बस यही है प्रार्थना,क्षमा याचना करूँ क्षमा याचना !!!
मेरे मन !! ज़रा ध्यान से सुन !!!
मेरे मन !! ज़रा ध्यान से सुन !!!
मत कर कोशिशें ख़ुश रहने की
तैयार कर स्वयं को सुख के ही सफ़र में
आने वाले दुख का सामना करने के लिए बेबाक होकर,
हर ख़ुशी को समझ ख़ुश हवाओं का सानिध्य,
और हर दुःख को समझ
आने वाली ख़ुशियों से पहले का मात्र एक पल,
मत कर कोशिशें समय को बांधने की,
क्योंकि जिसने समय को बांधना चाहा,
समय ने उसे ही हालात में जकड़ डाला,
खुल कर जी हर लम्हा,उत्सव मना ज़िन्दगी का
और डूब जा जीवंत क्रीड़ाओं के जश्न में,
मत ढूंढ कोई भी वजह जीने की
के तेरे जीने की वजह ख़ुद तेरे अरमान हैं,
पलकें झुका, बंद कर आँखें, ज़रा सा दिल के पास ला,
जिसे तू ढूँढे, वो तो तेरे हृदय में ही विराजमान है।।
मेरे मन !! ज़रा ध्यान से सुन !!!
दिल और दिमाग
क्या कभी इस पर ग़ौर फ़रमाया ???
दिल और दिमाग
दोनों का काम करने का तरीक़ा
बिल्कुल एक दूजे से अलग
दिमाग से सोचा जा सकता है,
और दिल हमेशा चाहता है,
ना जाने कितनी बार सोचा है जब कुछ करने को
तो वो भी नहीं हुआ जो होना चाहिए था,
पर जब जब चाहा है पूरी शिद्दत और मन्नत से कुछ भी,
तो असम्भव को भी सम्भव होते हुए देखा है।
बस फिर सोचना क्या?
चाहते हैं ना जी जान से !! जो भी चाहिये !!